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एनडीएए 2019 के तहत उक्त बातें इसकी महत्वपूर्ण प्रस्ताव का हिस्सा हैं और समिति से इनको मंजूरी मिलने के बाद इसके लिए 639.1 अरब डॉलर का अनुदान मंजूर हो जाएगा.
फोटोः ट्विटर-@PacificCommand
पीएम नरेंद्र मोदी ने कर्नाटक के कलबुर्गी में तीन मई को अपनी चुनावी रैली में कांग्रेस पर हमलावर रुख अपनाते हुए कहा कि यह धरती वीरों की भूमि है लेकिन कांग्रेस सेना के बहादुर जवानों के त्याग का सम्मान नहीं करती. जब हमारे जवानों ने सर्जिकल स्ट्राइक किया तो कांग्रेस ने उस पर सवाल उठाए. वे मुझसे सर्जिकल स्ट्राइक का सबूत मांगते रहे. सर्जिकल स्ट्राइक के बाद कांग्रेस के एक वरिष्ठ नेता ने हमारे मौजूदा आर्मी चीफ को 'गुंडा' कहा. इतिहास गवाह है कि इस धरती के वीर फील्ड मार्शल करियप्पा और जनरल थिमैया के साथ कांग्रेस सरकार ने कैसा बर्ताव किया? जनरल थिमैया को तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित नेहरू और रक्षा मंत्री कृष्णा मेनन ने अपमानित किया. इस संदर्भ में इतिहास के पन्नों को उलटकर जनरल थिमैया की कहानी पर आइए डालते हैं एक नजर:
जनरल कोडनडेरा सुब्बैया थिमैया
1906 में कर्नाटक में जन्मे थिमैया उसी कोडनडेरा समुदाय से ताल्लुक रखते थे जिससे देश के पहले कमांडर-इन-चीफ जनरल करियप्पा संबंधित थे. जनरल केएस थिमैया 1957-61 तक आर्मी चीफ रहे. द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान इंफ्रेंट्री ब्रिगेड संभालने वाले एकमात्र भारतीय सैन्य अधिकारी थे. 1962 में भारत-चीन युद्ध के 15 महीने पहले वह रिटायर हुए. उसके बाद वह साइप्रस में संयुक्त राष्ट्र शांति रक्षक दल के कमांडर नियुक्त हुए. इसी ड्यूटी के दौरान 18 दिसंबर, 1965 को उनका निधन हो गया.
विवाद
शिव कुमार वर्मा की किताब 1962 द वार दैट वाज नाट (1962 The War That Wasn't) में जनरल थिमैया के 1959 में इस्तीफा देने की घटना का विस्तार से जिक्र किया गया है. उसमें बताया गया है कि चीन के मोर्चे पर भारत की नीतियों से शीर्ष स्तर पर मतांतर था. उसी कड़ी में रक्षा मंत्री कृष्णा मेनन और थिमैया की मीटिंग हुई. वहां पर मेनन ने जनरल से कहा कि वह अपनी बात प्रधानमंत्री से सीधे कहने के बजाय पहले उनसे साझा कर मामले को इसी स्तर पर सुलझाएं. इसके साथ ही यह कहते हुए मेनन ने मीटिंग खत्म कर दी कि यदि मसले सार्वजनिक हुए तो उसके राजनीतिक प्रभाव की कीमत चुकानी होगी. इसके तत्काल बाद थिमैया ने इस्तीफा दे दिया.
प्रधानमंत्री पंडित नेहरू ने तत्काल उनको अपने पास बुलाया और लंबी बातचीत के बाद देश हित में आसन्न चीनी खतरे को देखते हुए इस्तीफा वापस लेने का आग्रह किया. नतीजतन जनरल थिमैया ने इस्तीफा वापस ले लिया. किताब के मुताबिक थिमैया के जाने के बाद उनके इस्तीफे की खबर को जानबूझकर मीडिया के समक्ष लीक कर दिया गया, जबकि इस्तीफे में लिखी बातों को छुपा लिया गया. उसका नतीजा यह हुआ कि अगले दिन सभी अखबारों की सुर्खियां जनरल थिमैया के इस्तीफ से पटी हुई थीं.
उसके दो दिन बाद दो सितंबर, 1959 को पंडित नेहरू ने संसद में इस मसले पर बयान देते हुए कहा कि उनके आग्रह को मानते हुए आर्मी चीफ ने इस्तीफा वापस ले लिया है. उन्होंने मिलिट्री पर सिविलयन अथॉरिटी की सर्वोच्चता बताते हुए कहा कि दरअसल अलग मिजाज के व्यक्तित्वों के कारण ऐसी परिस्थिति उत्पन्न हुई. इसके साथ ही उन्होंने जनरल थिमैया की आलोचना करते हुए कहा कि भारत और चीन के बीच सीमा संकट के बीच वह पद छोड़ना चाहते हैं. जनरल थिमैया के त्यागपत्र के मजमून को आज तक सार्वजनिक नहीं किया गया है.
नई दिल्ली : सुप्रीम कोर्ट के कॉलेजियम ने उत्तराखंड हाई कोर्ट के जस्टिस केएम जोसेफ की पदोन्नति की सिफारिश थी, लेकिन केंद्र सरकार ने कॉलेजियम की इस सिफारिश को ठुकरा दिया था. इस पर सरकार ने सफाई दी है कि सिफारिश ठुकराने के पीछे उत्तराखंड में राष्ट्रपति शासन का मामला कतई नहीं है. सरकार ने बुधवार को इस बात को खारिज कर दिया कि उत्तराखंड के मुख्य न्यायाधीश केएम जोसेफ की सुप्रीम में नियुक्ति के प्रस्ताव को उसने इसलिए ठुकरा दिया कि उन्होंने राज्य में राष्ट्रपति शासन लगाने के फैसले को पलट दिया था.
कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के तीन फैसलों से सरकार को यह अधिकार प्राप्त है कि वह न्यायालय के कॉलेजियम द्वारा भेजे गए प्रस्तावों पर पुनर्विचार करने के लिए कह सकती है. प्रसाद ने कहा कि वह पूरे अधिकार के साथ इस बात से इनकार करते हैं कि इसका उससे कोई लेना-देना है. उन्होंने कहा कि अपने रूख का समर्थन करने के लिए उनके पास दो स्पष्ट कारण हैं.
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कानून मंत्री ने कहा कि उत्तराखंड में तीनचौथाई बहुमत के साथ सरकार चुनी गई है. दूसरा, सुप्रीम कोर्ट के न्यायमूर्ति जेएस खेहर ने उस आदेश (न्यायमूर्ति जोसेफ) की पुष्टि की थी. न्यायमूर्ति खेहर ने राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग कानून को भी खारिज कर दिया था. इसके बाद भी वह राजग सरकार के कार्यकाल में प्रधान न्यायाधीश बने.
प्रसाद ने न्यायपालिका के संबंध में पूर्व प्रधान न्यायाधीश आरएम लोढ़ा की टिप्पणी पर कोई प्रतिक्रिया देने से इंकार कर दिया और कहा वह सेवानिवृत्त न्यायाधीश के बयान पर कोई टिप्पणी नहीं करना चाहेंगे.
सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश के रूप में न्यायमूर्ति जोसेफ की नियुक्ति को रोकने के फैसले के बारे में पूछे गए सवालों के जवाब में प्रसाद ने कहा कि सरकार के खिलाफ प्रायोजित आरोप लगाए जा रहे हैं. उन्होंने कहा कि आमतौर पर और विशेष रूप से कांग्रेस द्वारा सरकार के खिलाफ आरोप लगाए जा रहे हैं कि उत्तराखंड में राष्ट्रपति शासन संबंधी उनके फैसले को लेकर उनकी नियुक्ति को रोका गया.
बता दें कि सरकार ने 26 अप्रैल को उच्चतम न्यायालय कॉलेजियम से कहा था कि वह न्यायमूर्ति जोसेफ के संबंध में अपनी सिफारिश पर पुनर्विचार करे.